राजस्थान में बोली जाने वाली भाषा


राजस्थानी

बोलने का स्थान :- भारत, पाकिस्तान
मातृभाषी वक्ता :- 2,00,00,000

भाषा परिवार

हिन्द-यूरोपीय :-
  • हिन्द-ईरानी
  • हिन्द-आर्य
  • संस्कृत
  • केन्द्रीय क्षेत्र (हिन्दी)
  • राजस्थानी

लिपि :- देवनागरी

राजस्थानी भाषा राजस्थान में बोली जाने वाली भाषाओं को कहा जाता है। राजस्थानी भाषाऐं भारत में लगभग नौ करोङ लोगो के द्वारा बोली जाती है।इस भाषा समूह की सर्वाधिक बडी बोली मारवाड़ी है, जो लगभग 4.5 करोङ से 5 करोङ लोगो द्वारा बोली जाती है।

हिन्दी, ब्रजभाषा, मेवाती, मारवाड़ी,शेखावाटी, हाड़ौती जैसी कई भाषाओं के मिश्रित झुंड को राजस्थानी भाषा का नाम दिया गया इसे पहले मूङिया(बणिया या महाजनी) लिपि मे लिखते थे।इसे वर्तमान में देवनागरी में लिखा जाता है। साहित्यिक आधार पर सही अर्थों में इस भाषा का नाम ब्रजभाषा होना चाहिए।

राजस्थानी भाषाऐं भारत के राजस्थान प्रान्त व मालवा क्षेत्र तथा पाकिस्तान के कुछ भागों में करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाती हैं। इन भाषाओं का इतिहास बहुत पुराना है। इन भाषाओं में प्राचीन साहित्य विपुल मात्रा में उपलब्ध है। इन भाषाओं में विपुल मात्रा में लोक गीत, संगीत, नृत्य, नाटक, कथा, कहानी आदि उपलब्ध हैं। इन भाषाओं को सरकारी मान्यता प्राप्त नहीं है। इस कारण इन्हें विद्यालयों में पढाया नहीं जाता है। इस कारण शिक्षित वर्ग धीरे धीरे इन भाषाओं का उपयोग छोड़ रहा है, परिणामस्वरूप, ये भाषाऐं धीरे धीरे ह्रास की और अग्रसर है। कुछ मातृभाषा प्रेमी अच्छे व्यक्ति ऐसी भाषाओं को सरकारी मान्यता दिलाने के प्रयास में लगे हुए हैं।

इसी प्रयास हेतु कवि सुखवीर सिहं कविया का गीत "मायड़ बोली" एक प्रतिगीत एक प्रेरक गीत के रूप में है जो राजस्थानी भाषाओं की महत्ता बताता है और ज्यादा से ज्यादा राजस्थानी भाषाऐं बोलने हेतु प्रेरित करता है - मीठो गुड़ मिश्री मीठी, मीठी जेडी खांड मीठी बोली मायडी और मीठो राजस्थान ।।

गण गौरैयाँ रा गीत भूल्या भूल्या गींदड़ आळी होळी नै, के हुयो धोरां का बासी, क्यूँ भूल्या मायड़ बोली नै ।।

कालबेलियो घुमर भूल्या नखराळी मूमल झूमर भूल्या लोक नृत्य कोई बच्या रे कोनी क्यू भूल्या गीतां री झोळी नै, कै हुयो धोरां का बासी क्यू भूल्या मायड़ बोली नै ।।

जी भाषा में राणा रुओ प्रण है जी भाषा में मीरां रो मन मन है जी भाषा नै रटी राजिया, जी भाषा मैं हम्मीर रो हट है धुंधली कर दी आ वीरां के शीस तिलक री रोळी नै, के हुयो धोरां का बासी, क्यू भूल्या मायड़ बोली नै ।।

घणा मान रीतां में होवै गाळ भी जठ गीतां में होवे प्रेम भाव हगळा बतलाता क्यू मेटि ई रंगोंळी नै, के हुयो धोरां का बासी क्यू भूल्या मायड़ बोली नै ।।

पीर राम रा पर्चा भूल्या माँ करणी री चिरजा भूल्या खम्माघणी ना घणीखम्मा है भूल्या धोक प्रणाम हमझोळी नै के हुयो धोरां का बासी, क्यू भूल्या मायड़ बोली नै ।।

बिन मेवाड़ी मेवाड़ कठै मारवाड़ री शान कठै मायड़ बोली रही नहीँ तो मुच्चयाँळो राजस्थान कठै ।।

(थारी मायड़ करे पुकार जागणु अब तो पड़सी रै - Repeat ) - सुखवीर सिंह कविया


Source :-Wikipedia



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